नॉनवेज दूध पर महायुद्ध: भारत और अमेरिका — दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र — एक ऐसे मुकाम पर आ खड़े हुए हैं जहां उनके बीच का व्यापारिक रिश्ता गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। वर्षों से दोनों देशों ने रणनीतिक सहयोग, रक्षा साझेदारी और तकनीकी समझौतों के जरिए अपने संबंधों को मजबूत किया है, लेकिन अब मामला सिर्फ कूटनीति या रक्षा से जुड़ा नहीं है। यह सीधा टकराव है भारत की सांस्कृतिक पहचान और अमेरिका की आर्थिक महत्वाकांक्षा के बीच।
डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में जो ट्रेड वार शुरू हुआ था, वह भले ही धीरे-धीरे शांत हो गया हो, लेकिन कुछ मुद्दे अब भी नासूर की तरह बाकी हैं — और उनमें से सबसे अहम मुद्दा है अमेरिका द्वारा भारत को अपने डेयरी उत्पादों के लिए बाजार खोलने का दबाव।
आखिर क्यों शुरू हुआ नॉनवेज दूध पर महायुद्ध?
यह विवाद सुनने में साधारण लग सकता है — दूध को लेकर इतनी राजनीति क्यों? लेकिन जैसे ही आप इसकी गहराई में उतरेंगे, यह समझ आएगा कि मामला सिर्फ डेयरी व्यापार का नहीं है, यह भारत की आस्था, आजीविका और स्वदेशी उत्पादों के भविष्य से जुड़ा है।
अमेरिका चाहता है कि भारत उसके डेयरी उत्पादों को स्वीकार करे, जिनमें दूध, मिल्क पाउडर, चीज़ और मक्खन शामिल हैं। लेकिन भारत की आपत्ति है कि अमेरिकी डेयरी में इस्तेमाल होने वाला दूध “नॉनवेज” है। इसका मतलब यह है कि उस दूध का उत्पादन करने वाली गायों को जो आहार दिया जाता है, उसमें जानवरों का खून, मांस और हड्डियों से बने उत्पाद होते हैं — जिसे ‘ब्लड मील’ कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं से टकराव
भारत में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक मानी जाती है। दूध, दही, घी आदि न केवल भोजन में उपयोग किए जाते हैं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठानों में भी इनका विशेष स्थान होता है। ऐसे में यदि गाय को ऐसा चारा दिया जाए जिसमें मांस या खून हो, तो उससे प्राप्त दूध को पवित्र नहीं माना जा सकता।
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भारत की बड़ी आबादी शाकाहारी है, और उनके लिए यह दूध न केवल अनुपयुक्त बल्कि सांस्कृतिक रूप से अपवित्र है। इसलिए भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ऐसा दूध आयात नहीं करेगी, जो इन धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के विपरीत हो।
अमेरिकी गायों को क्या खिलाया जाता है?
अमेरिका में डेयरी उद्योग एक विशाल व्यापार है, और वहां की डेयरी फार्म्स में गायों को मांस आधारित प्रोटीन दिया जाता है ताकि उनका दूध उत्पादन बढ़ सके। इन चारे में ‘ब्लड मील’ शामिल होता है, जो मांस उद्योग से प्राप्त किया जाता है। जानवरों का खून जमा कर उसे सुखाया जाता है, फिर उसे चारे में मिलाया जाता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है, खासकर ‘लाइसीन’ नामक अमीनो एसिड, जो दूध उत्पादन में मदद करता है।
इसके अलावा कई बार मछलियों, पोल्ट्री, कुत्ते-बिल्ली के बचे हुए मांस का भी उपयोग चारे में होता है। ये सभी तत्व भारत में पूरी तरह से निषिद्ध और अस्वीकार्य माने जाते हैं।

भारत का सख्त रुख: ‘नॉनवेज मिल्क’ नहीं चलेगा
भारत सरकार ने अमेरिका को साफ कह दिया है कि वह ऐसा दूध नहीं आयात करेगी जिसमें किसी भी प्रकार से मांसाहारी चारा उपयोग में लाया गया हो। इसके लिए भारत ने एक कड़ा सर्टिफिकेशन सिस्टम लागू किया है, जिसमें किसी भी आयातित डेयरी प्रोडक्ट को यह प्रमाण देना होगा कि गाय को पूरी तरह शाकाहारी चारा दिया गया था।
भारत की यह नीति केवल धार्मिक भावनाओं के संरक्षण तक सीमित नहीं है, यह घरेलू डेयरी उद्योग की सुरक्षा से भी जुड़ी है।
भारतीय किसानों के लिए खतरा
भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार भारत ने 23.92 करोड़ टन दूध का उत्पादन किया और यह सेक्टर करीब 8 करोड़ छोटे और सीमांत किसानों को रोजगार देता है। यह पूरा डेयरी इकोसिस्टम ग्रामीण भारत की रीढ़ है।
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अगर भारत अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए बाजार खोलता है, तो इसका सीधा असर इन किसानों पर पड़ेगा। भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट बताती है कि इससे दूध की कीमतों में 15% तक की गिरावट आ सकती है। इसका अर्थ होगा करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये का सालाना नुकसान — और यह नुकसान उन किसानों को होगा जिनकी जीविका पूरी तरह इसी पर निर्भर है।
अमेरिका का दबाव और WTO में शिकायत
अमेरिका बार-बार भारत से आग्रह कर रहा है कि वह अपने डेयरी और कृषि बाजार को खोले ताकि अमेरिका अपने 8.22 अरब डॉलर के डेयरी निर्यात को भारत में विस्तार दे सके। लेकिन भारत इसे ‘रेड लाइन’ यानी समझौते से परे का मामला बता चुका है।
अमेरिका ने भारत के नियमों को ‘अनावश्यक व्यापारिक बाधा’ बताते हुए विश्व व्यापार संगठन (WTO) में इसकी शिकायत भी कर दी है। लेकिन भारत का पक्ष स्पष्ट है — जब तक अमेरिकी डेयरी में मांसाहारी चारा शामिल रहेगा, भारत का बाजार उनके लिए नहीं खुलेगा।
टैरिफ का मजबूत सुरक्षा कवच
भारत ने डेयरी उत्पादों पर 30% से 60% तक के आयात शुल्क लगाए हैं। जैसे कि चीज़ पर 30%, मक्खन पर 40% और मिल्क पाउडर पर 60% का टैरिफ। इसका उद्देश्य यही है कि सस्ते विदेशी उत्पाद भारत में आकर घरेलू बाजार को नुकसान न पहुंचाएं। यह नीतिगत निर्णय न केवल व्यापारिक हितों की रक्षा करता है बल्कि किसानों के हितों का भी संरक्षण करता है।
क्या है ट्रंप की डेडलाइन और अंतरिम डील की स्थिति?
डोनाल्ड ट्रंप ने पहले भारत को 9 जुलाई तक का समय दिया था ताकि ट्रेड डील पूरी की जा सके, लेकिन अब यह डेडलाइन बढ़ाकर 1 अगस्त कर दी गई है। दोनों देश फिलहाल एक अंतरिम ट्रेड डील पर काम कर रहे हैं जिसका उद्देश्य 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाना है।
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लेकिन यह डील फिलहाल डेयरी और कृषि सेक्टर के विवाद में अटक गई है। भारत ने जहां नॉनवेज दूध को लेकर सख्त रुख अपनाया है, वहीं अमेरिका इस मुद्दे को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रहा है।
अगर भारत झुका तो क्या होगा?
अगर भारत ने अमेरिकी दबाव में आकर अपने डेयरी बाजार को खोला, तो सबसे बड़ा नुकसान उसके करोड़ों छोटे किसानों को होगा। सस्ते अमेरिकी उत्पाद स्थानीय बाजार में उतरते ही कीमतों का संतुलन बिगड़ जाएगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा और देश में दूध की गुणवत्ता, पारदर्शिता और धार्मिक मान्यताओं पर भी सवाल उठेंगे।
वहीं, यदि भारत अपने फैसले पर अडिग रहता है, तो अमेरिका भारत पर फिर से टैरिफ बढ़ा सकता है। डोनाल्ड ट्रंप पहले भी भारत पर 26% तक का टैरिफ लगा चुके हैं, और अगर यह डील 1 अगस्त तक पूरी नहीं होती, तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है।